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अध्याय 1: पारिस्थितिकी (Ecology)

1. पर्यावरण (Environment)

  • परिभाषा: किसी भी जीवित जीव के चारों ओर का वह सब कुछ जो उसके जीवन काल में उसे प्रभावित करता है, पर्यावरण कहलाता है।

  • इसमें सभी जैविक (Biotic) जैसे- पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और अजैविक (Abiotic) जैसे- प्रकाश, हवा, पानी, मिट्टी शामिल हैं। दोनों घटक आपस में लगातार क्रिया करते हैं।

2. पारिस्थितिकी (Ecology)

  • परिभाषा: जीवों का एक-दूसरे के साथ और उनके भौतिक पर्यावरण के साथ संबंधों के वैज्ञानिक अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।

  • यह शब्द जर्मन जीवविज्ञानी अर्नस्ट हेकेल (Ernst Haeckel) द्वारा दिया गया था।

3. संगठन के स्तर (Levels of Organization in Ecology)

पारिस्थितिकी में अध्ययन के 6 मुख्य स्तर होते हैं (छोटे से बड़े के क्रम में):

  1. जीव (Organism/Individual): यह पारिस्थितिकी की सबसे बुनियादी इकाई है। एक स्वतंत्र रूप से कार्य करने वाला प्राणी।

  2. जनसंख्या (Population): एक ही प्रजाति (Species) के जीवों का समूह जो एक निश्चित समय में एक विशेष क्षेत्र में रहते हैं।

  3. समुदाय (Community): एक विशेष क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न प्रजातियों की आबादी का समूह (जैसे- एक जंगल में पेड़, कीड़े और जानवर सब मिलकर एक समुदाय बनाते हैं)।

  4. पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem): जब समुदाय (Biotic) और उसका भौतिक वातावरण (Abiotic) एक साथ मिलकर काम करते हैं।

  5. बायोम (Biome): एक बहुत बड़ा क्षेत्रीय क्षेत्र जिसमें एक समान जलवायु, मिट्टी और वनस्पति पाई जाती है (जैसे- रेगिस्तान, टुंड्रा, वर्षावन)।

  6. जैवमंडल (Biosphere): पृथ्वी का वह हिस्सा जहाँ जीवन संभव है। इसमें स्थलमंडल (Lithosphere), जलमंडल (Hydrosphere), और वायुमंडल (Atmosphere) का मिलन क्षेत्र शामिल है।

4. पारिस्थितिकी तंत्र के घटक (Components of an Ecosystem)

  1. अजैविक घटक (Abiotic Components):

    • ऊर्जा (Energy): मुख्य रूप से सूर्य का प्रकाश।

    • तापमान: जीवों के जीवित रहने और चयापचय (Metabolism) को प्रभावित करता है।

    • पानी: जीवन के लिए सबसे आवश्यक।

    • मिट्टी (Edaphic factors): खनिजों का स्रोत।

  2. जैविक घटक (Biotic Components):

    • उत्पादक (Producers/Autotrophs): जो मुख्य रूप से प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं (जैसे- हरे पौधे, फाइटोप्लांकटन)।

    • उपभोक्ता (Consumers/Heterotrophs): जो दूसरों पर निर्भर होते हैं (शाकाहारी, मांसाहारी, सर्वाहारी)।

    • अपघटक (Decomposers/Saprotrophs): बैक्टीरिया और कवक जो मृत कार्बनिक पदार्थों को सरल तत्वों में तोड़ते हैं।

अध्याय 2: पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य (Functions of an Ecosystem)

पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के भीतर होने वाली सभी गतिविधियाँ और अंतःक्रियाएँ इसके सुचारू रूप से चलने के लिए आवश्यक हैं। इसके तीन मुख्य कार्य हैं, जिन्हें हम क्रम से पढ़ेंगे:

1. ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow)

  • ऊर्जा का स्रोत: पृथ्वी पर लगभग सभी पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए सूर्य की ऊर्जा (Solar Energy) ही प्राथमिक स्रोत है।

  • एकदिशीय प्रवाह (Unidirectional Flow): पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एक ही दिशा में होता है—सूर्य से उत्पादक (पौधे) और फिर उपभोक्ताओं (जानवरों) की ओर। यह ऊर्जा कभी वापस सूर्य की ओर नहीं लौटती।

  • त्रैमासिक ह्रास (Energy Loss): श्वसन (Respiration) और अन्य जैविक क्रियाओं के दौरान अधिकांश ऊर्जा ऊष्मा (Heat) के रूप में पर्यावरण में खो जाती है।

2. पोषण स्तर (Trophic Levels)

ऊर्जा प्रवाह के आधार पर जीवों को विभिन्न स्तरों में विभाजित किया गया है:

  • प्रथम पोषण स्तर (Trophic Level 1): उत्पादक (Producers) – जैसे हरे पौधे।

  • द्वितीय पोषण स्तर (Trophic Level 2): प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumers) – शाकाहारी जीव (जैसे टिड्डा, गाय)।

  • तृतीय पोषण स्तर (Trophic Level 3): द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumers) – मांसाहारी जीव (जैसे मेंढक)।

  • चतुर्थ पोषण स्तर (Trophic Level 4): तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumers) – शीर्ष मांसाहारी (जैसे बाज, शेर)।

3. लिंडेमैन का 10% नियम (Lindeman’s 10% Law)

  • इस नियम के अनुसार, जब ऊर्जा एक पोषण स्तर से अगले उच्च स्तर पर स्थानांतरित होती है, तो केवल 10% ऊर्जा ही अगले स्तर को प्राप्त होती है

  • शेष 90% ऊर्जा जीव की अपनी चयापचय (Metabolic) क्रियाओं में खर्च हो जाती है या ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि खाद्य श्रृंखला में 4-5 से अधिक स्तर नहीं होते, क्योंकि ऊपर जाते-जाते ऊर्जा बहुत कम बचती है।

4. खाद्य श्रृंखला (Food Chain)

पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों का वह क्रम जिसमें एक जीव दूसरे जीव को खाता है और ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, खाद्य श्रृंखला कहलाता है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:

  • A. चराई खाद्य श्रृंखला (Grazing Food Chain – GFC):

    • यह श्रृंखला सीधे सूर्य की ऊर्जा पर निर्भर करती है और हरे पौधों (Autotrophs) से शुरू होती है।

    • उदाहरण: घास →टिड्डा  → मेंढक → सांप  → बाज।

  • B. अपरद खाद्य श्रृंखला (Detritus Food Chain – DFC):

    • यह श्रृंखला मृत कार्बनिक पदार्थों (Dead Organic Matter), सड़े-गले पत्तों या मृत जीवों से शुरू होती है।

    • इसमें ऊर्जा का मुख्य स्रोत अपघटक (Decomposers) जैसे कवक (Fungi) और बैक्टीरिया होते हैं।

    • महत्वपूर्ण तथ्य: यह पारिस्थितिकी तंत्र में कचरे को साफ करने और पोषक तत्वों को रीसायकल करने के लिए बहुत आवश्यक है।

5. खाद्य जाल (Food Web)

  • परिभाषा: एक पारिस्थितिकी तंत्र में कई खाद्य श्रृंखलाएं (Food Chains) आपस में एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। जीवों के खाने और खाए जाने के इस नेटवर्क या जटिल जाल को ‘खाद्य जाल’ (Food Web) कहते हैं।

  • महत्व: वास्तविक प्रकृति में कोई भी जीव केवल एक ही प्रकार के जीव पर निर्भर नहीं रहता। उदाहरण के लिए, एक बाज सिर्फ सांप को नहीं खाता, वह चूहे या मेंढक को भी खा सकता है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता (Stability): खाद्य जाल जितना अधिक जटिल और बड़ा होगा, पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही अधिक स्थिर (Stable) होगा। यदि कोई एक प्रजाति खत्म भी हो जाए, तो उपभोक्ताओं के पास भोजन के अन्य विकल्प मौजूद रहते हैं।

6. पारिस्थितिकी पिरामिड (Ecological Pyramids)

विभिन्न पोषण स्तरों (Trophic Levels) पर जीवों की संख्या, जैवभार (Biomass), और ऊर्जा के बीच के संबंधों को जब हम चित्र या आरेख (Diagram) के रूप में दर्शाते हैं, तो उसे पारिस्थितिकी पिरामिड कहते हैं।

इसके मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं:

A. संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers)

यह प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों की कुल संख्या को दर्शाता है। यह दो प्रकार का हो सकता है:

  • सीधा (Upright): घास के मैदान या तालाब के पारिस्थितिकी तंत्र में यह सीधा होता है, क्योंकि यहाँ उत्पादकों (घास/पौधों) की संख्या सबसे अधिक होती है और शीर्ष उपभोक्ताओं (शेर/बाज) की संख्या सबसे कम होती है।

  • उल्टा (Inverted) / परजीवी पिरामिड: एक बड़े पेड़ के पारिस्थितिकी तंत्र में यह उल्टा हो सकता है, जहाँ उत्पादक केवल एक (1 पेड़) होता है, लेकिन उस पर निर्भर रहने वाले पक्षियों और परजीवियों (Parasites) की संख्या बहुत अधिक होती है।

B. जैवभार का पिरामिड (Pyramid of Biomass)

यह प्रत्येक पोषण स्तर पर रहने वाले जीवों के कुल सूखे वजन (Dry Weight) या जैवभार को दर्शाता है।

  • स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Terrestrial Ecosystem): जमीन पर (जैसे जंगल या घास के मैदान में) यह हमेशा सीधा (Upright) होता है, क्योंकि पेड़ों का वजन उन पर रहने वाले जानवरों से कहीं अधिक होता है।

  • जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem): तालाब या समुद्र में यह पिरामिड उल्टा (Inverted) हो जाता है। (यह बहुत महत्वपूर्ण यूपीएससी फैक्ट है)। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फाइटोप्लांकटन (Phytoplankton – उत्पादक) का जैवभार बहुत कम होता है, जबकि उन्हें खाने वाली बड़ी मछलियों का जैवभार बहुत अधिक होता है।

C. ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy)

  • हमेशा सीधा (Always Upright): ऊर्जा का पिरामिड किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में हमेशा सीधा होता है। इसका कोई अपवाद नहीं है।

  • ऐसा इसलिए है क्योंकि लिंडेमैन के 10% नियम के अनुसार, निचले स्तर से ऊपरी स्तर पर जाने पर ऊर्जा हमेशा कम होती जाती है और ऊष्मा (Heat) के रूप में नष्ट होती है।

7. प्रदूषकों का खाद्य श्रृंखला में प्रभाव (Bioaccumulation & Biomagnification)

जब पर्यावरण में कोई हानिकारक या जहरीला रसायन (जैसे भारी धातुएं, DDT, प्लास्टिक आदि) प्रवेश करता है, तो वह खाद्य श्रृंखला को दो तरीकों से प्रभावित करता है:

A. जैव-संचय (Bioaccumulation)

  • परिभाषा: यह प्रक्रिया दर्शाती है कि कोई प्रदूषक या रसायन खाद्य श्रृंखला के पहले जीव (या किसी एक विशेष जीव) के शरीर में किस प्रकार प्रवेश करता है और जमा होता है।

  • इसमें प्रदूषक के शरीर में इकट्ठा होने की दर (Absorption Rate), उसके शरीर से बाहर निकलने या नष्ट होने की दर (Excretion Rate) से अधिक होती है।

  • याद रखने योग्य तथ्य: जैव-संचय केवल एक ही पोषण स्तर (Same Trophic Level) या एक ही जीव के भीतर समय के साथ रसायन के बढ़ने को दिखाता है।

B. जैव-आवर्धन (Biomagnification)

    • परिभाषा: जब कोई जहरीला रसायन खाद्य श्रृंखला में एक पोषण स्तर से दूसरे उच्च पोषण स्तर पर स्थानांतरित होता है, तो उसकी सांद्रता (Concentration) बढ़ती चली जाती है। इसी प्रक्रिया को ‘जैव-आवर्धन’ कहते हैं।

  • शर्तें (Biomagnification के लिए जरूरी गुण): कोई भी रसायन तभी जैव-आवर्धन कर सकता है जब वह:

    1. दीर्घकालिक हो (Persistent): वह पर्यावरण में जल्दी नष्ट न हो।

    2. गतिशील हो (Mobile): पानी या भोजन के माध्यम से एक जीव से दूसरे जीव में जा सके।

    3. वसा में घुलनशील हो (Fat-soluble / Lipophilic): वह पानी में नहीं बल्कि जीवों की चर्बी (Fat) में जमा होता हो (ताकि पेशाब के रास्ते बाहर न निकले)।

    4. जैविक रूप से सक्रिय हो (Biologically active): जीवों के शरीर के अंदर काम करता हो।

  • उदाहरण: यदि पानी में DDT की बहुत कम मात्रा है, तो उसे खाने वाले फाइटोप्लांकटन में उसकी मात्रा थोड़ी बढ़ेगी, छोटी मछलियों में और बढ़ेगी, और अंत में मछलियों को खाने वाले शीर्ष पक्षी (जैसे बाज) में उसकी सांद्रता इतनी अधिक हो जाएगी कि उनके अंडों के छिलके पतले होने लगेंगे और फूट जाएंगे।

8. जैविक अंतःक्रियाएं (Biotic Interactions)

पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न प्रजातियों के जीव एक-दूसरे के साथ कई तरह से क्रिया करते हैं। पीडीएफ के क्रम के अनुसार ये अंतःक्रियाएं निम्नलिखित हैं:

  1. सहोपकारिता/सहजीवन (Mutualism – ( + / +): इसमें दोनों प्रजातियों को एक-दूसरे से लाभ होता है।

    • उदाहरण: लाइकेन (Lichen) – कवक (Fungi) और शैवाल (Algae) का संबंध। परागण करने वाली मधुमक्खियां और फूल।

  2. सहभोजिता (Commensalism – ( + / 0): इसमें एक प्रजाति को लाभ होता है, जबकि दूसरी प्रजाति को न तो लाभ होता है और न ही कोई नुकसान।

    • उदाहरण: शार्क मछली के साथ तैरने वाली सकरफिश (Remora), या गाय के साथ चलने वाले बगुले (Cattle Egrets)।

  3. असहभोजिता (Amensalism -( – / 0): इसमें एक प्रजाति को नुकसान होता है, जबकि दूसरी प्रजाति अप्रभावित रहती है।

    • उदाहरण: बड़े पेड़ की छाया के कारण छोटे पौधों को धूप न मिलना, या पेनिसिलियम कवक द्वारा बैक्टीरिया को मारना।

  4. परजीविता (Parasitism – ( + / –): इसमें एक जीव (परजीवी) दूसरे जीव (पोषक/Host) के शरीर पर रहकर पोषण प्राप्त करता है, जिससे पोषक को नुकसान होता है।

    • उदाहरण: अमरबेल (Cuscuta) का पौधा, पेट के कीड़े या जूँ।

  5. शिकार / प्रभक्षण (Predation – ( + / –): इसमें एक जीव (शिकारी) दूसरे जीव (शिकार) को मार कर खा जाता है।

    • उदाहरण: शेर द्वारा हिरण का शिकार।

  6. प्रतिस्पर्धा (Competition – ( – / –): जब दो प्रजातियां एक ही सीमित संसाधन (जैसे भोजन, पानी या स्थान) के लिए लड़ती हैं, तो दोनों को नुकसान उठाना पड़ता है।

9. जैव-भू-रासायनिक चक्र / पोषक चक्र (Biogeochemical Cycles)

  • परिभाषा: पर्यावरण (अजैविक वातावरण) से पोषक तत्वों (Nutrients) का जीवों (जैविक घटकों) के शरीर में जाना और फिर जीवों के मृत होने या अपघटन के बाद वापस पर्यावरण में लौट आने के इस निरंतर चक्र को ‘पोषक चक्र’ या ‘बायोजियोकेमिकल चक्र’ कहते हैं।

  • पोषक तत्वों की आवश्यकता: जीवों को अपनी वृद्धि, चयापचय और जीवन प्रक्रियाओं के लिए मुख्य रूप से कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और सल्फर जैसे तत्वों की आवश्यकता होती है।

पोषक चक्रों को उनके भंडार (Reservoir) के आधार पर मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:

A. गैसीय चक्र (Gaseous Cycles)

इन चक्रों में पोषक तत्वों का मुख्य भंडार (Reservoir) वायुमंडल (Atmosphere) या जलमंडल (Hydrosphere) होता है। ये चक्र बहुत तेजी से चलते हैं (Perfect Cycles)।

इसमें निम्नलिखित चक्र शामिल हैं:

1. जल चक्र (Water/Hydrological Cycle): * सौर विकिरण के कारण पानी का वाष्पीकरण (Evaporation) होता है, जिसके बाद संघनन (Condensation) से बादल बनते हैं और अंततः वर्षा (Precipitation) के माध्यम से पानी वापस जमीन और समुद्र में लौट आता है।

2. कार्बन चक्र (Carbon Cycle):

  • स्रोत और चक्र: कार्बन वायुमंडल में मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) के रूप में पाया जाता है।

  • पौधे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के माध्यम से इसे ग्रहण करते हैं। जीव जब श्वसन (Respiration) करते हैं, तो $CO_2$ वापस वायुमंडल में मुक्त होती है।

  • जीवों के मरने के बाद उनके अवशेष जब लाखों वर्षों तक जमीन के नीचे दबे रहते हैं, तो वे जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels – कोयला, तेल) में बदल जाते हैं, जिन्हें जलाने पर $CO_2$ फिर से वायुमंडल में चली जाती है।

3. नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle): (यह सबसे महत्वपूर्ण गैसीय चक्र है)

वायुमंडल में 78% नाइट्रोजन गैस पाई जाती है, लेकिन पौधे इसे सीधे ग्रहण नहीं कर सकते। इसलिए यह निम्नलिखित चरणों में पूरा होता है:

  • A. नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation): वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनिया या नाइट्रेट्स में बदलना। यह आकाशीय बिजली चमकने से या कुछ विशेष बैक्टीरिया (जैसे दलहनी फसलों की जड़ों में पाया जाने वाला Rhizobium, और मिट्टी में मुक्त रूप से रहने वाला Azotobacter) द्वारा किया जाता है।

  • B. नित्रीकरण (Nitrification): अमोनिया को पहले नाइट्राइट ($NO_2^-$) और फिर नाइट्रेट ($NO_3^-$) में बदलना। यह काम Nitrosomonas और Nitrobacter बैक्टीरिया करते हैं। पौधे नाइट्रोजन को इसी नाइट्रेट रूप में सोखते हैं।

  • C. आत्मसातीकरण (Assimilation): पौधे इस नाइट्रोजन का उपयोग करके अमीनो एसिड और प्रोटीन बनाते हैं।

  • D. अमोनिकरण (Ammonification): जब पौधे और जानवर मर जाते हैं, तो अपघटक (Decomposers) उनके जैविक नाइट्रोजन को वापस अमोनिया में बदल देते हैं।

  • E. विनित्रीकरण (Denitrification): मिट्टी में मौजूद कुछ बैक्टीरिया (जैसे Pseudomonas और Thiobacillus) नाइट्रेट्स को वापस नाइट्रोजन गैस ($N_2$) में बदलकर वायुमंडल में भेज देते हैं।

B. अवसादी चक्र (Sedimentary Cycles)

इन चक्रों में पोषक तत्वों का मुख्य भंडार भूपर्पटी (Earth’s Crust / चट्टानें और मिट्टी) होता है। ये चक्र गैसीय चक्रों की तुलना में काफी धीमे होते हैं (Imperfect Cycles)।

इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

1. फॉस्फोरस चक्र (Phosphorus Cycle):

  • फॉस्फोरस का मुख्य स्रोत चट्टानें (Rocks) हैं। चट्टानों के अपक्षय (Weathering/टूटने) से फॉस्फोरस मिट्टी में घुल जाता है, जहाँ से इसे पौधे सोखते हैं। यह चक्र वायुमंडल में नहीं जाता (गैस के रूप में नहीं बदलता)।

2. सल्फर चक्र (Sulphur Cycle):

  • सल्फर का मुख्य भंडार भी चट्टानों में होता है, लेकिन यह गैसीय और अवसादी दोनों प्रकार का व्यवहार कर सकता है, क्योंकि ज्वालामुखी विस्फोट या जीवाश्म ईंधन के जलने से सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) गैस भी वायुमंडल में मुक्त होती है।

10. पारिस्थितिक अनुक्रमण (Ecological Succession)

  • परिभाषा: समय के साथ किसी निश्चित क्षेत्र की प्रजातियों की संरचना (Species Structure) में होने वाले क्रमिक और पूर्वानुमानित (Predictable) बदलाव को पारिस्थितिक अनुक्रमण कहते हैं।

  • अंतिम अवस्था: अंत में एक स्थिर समुदाय स्थापित होता है जिसे चरम समुदाय (Climax Community) कहा जाता है, जो वहां की जलवायु के साथ संतुलन में होता है।

A. अनुक्रमण के चरण (Stages of Succession / Seral Stages)

अनुक्रमण की प्रक्रिया में पूरा समुदाय कई क्रमिक चरणों से गुजरता है। इन चरणों को सेरल चरण (Seral Stages) या ‘सेरे’ (Sere) कहा जाता है।

अनुक्रमण के प्रकार:

  1. अग्रणी समुदाय (Pioneer Community): यह सबसे पहला चरण है। जो प्रजातियां किसी खाली क्षेत्र (Bare area) पर सबसे पहले कब्जा करती हैं, उन्हें अग्रणी प्रजाति (Pioneer Species) कहते हैं।

    • स्थलीय (जमीन पर): लाइकेन (Lichens) और मॉस (Mosses)। ये चट्टानों को तोड़कर मिट्टी बनाने का काम करते हैं।

    • जलीय (पानी में): फाइटोप्लांकटन (Phytoplanktons) और छोटे शैवाल।

  2. मध्यवर्ती या सेरल चरण (Seral Stages): ये पायनियर स्पीशीज और चरम समुदाय के बीच के बदलते हुए अस्थायी चरण हैं। इसमें घास, झाड़ियाँ और फिर छोटे पेड़ आते हैं। यहाँ जैव विविधता लगातार बदलती रहती है।

  3. चरम समुदाय (Climax Community): यह अनुक्रमण का अंतिम और स्थिर (Stable) चरण है।

    1. यह समुदाय वहां की जलवायु (Climate) के साथ पूरी तरह से संतुलन में होता है।

जब तक वहां की जलवायु में कोई बड़ा बदलाव या प्राकृतिक आपदा नहीं आती, यह समुदाय वैसा ही बना रहता है (जैसे- एक घना जंगल)।

B. अनुक्रमण के अन्य महत्वपूर्ण प्रकार (Based on Cause/Origin)

किताब के अनुसार, उत्पत्ति और कारणों के आधार पर अनुक्रमण को इस प्रकार भी वर्गीकृत किया जाता है:

  1. स्वजात अनुक्रमण (Autogenic Succession): * जब अनुक्रमण में बदलाव वहां रहने वाले जीवों (जैविक घटकों) की अपनी गतिविधियों के कारण होता है, तो उसे स्वजात अनुक्रमण कहते हैं।

    • उदाहरण: लाइकेन द्वारा छोड़े गए एसिड से चट्टानें टूटती हैं और मिट्टी बनती है, जिससे वहां दूसरी नई प्रजातियों के उगने का रास्ता साफ होता है।

  2. परजात अनुक्रमण (Allogenic Succession): * जब अनुक्रमण में बदलाव किसी बाहरी या अजैविक कारकों (Abiotic factors) के कारण होता है, तो उसे परजात अनुक्रमण कहते हैं।

    • उदाहरण: किसी क्षेत्र में मिट्टी के कटाव (Soil erosion), आग लगने, या जलवायु परिवर्तन के कारण वहां की वनस्पतियों का बदल जाना।

  3. स्वपोषी अनुक्रमण (Autotrophic Succession): * यह अनुक्रमण उन क्षेत्रों में होता है जहाँ शुरुआत में हरे पौधों (प्राइमरी प्रोड्यूसर्स) की संख्या बहुत अधिक होती है। यहाँ समय के साथ ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।

  4. परपोषी अनुक्रमण (Heterotrophic Succession): * यह अनुक्रमण वहाँ शुरू होता है जहाँ शुरुआत में परपोषी जीव (Heterotrophs) जैसे बैक्टीरिया, कवक या जानवर हावी होते हैं।

    • उदाहरण: एक गिरे हुए सड़ते हुए पेड़ के तने या सीवेज के पानी में होने वाला क्रमिक बदलाव।

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