‘कार्टाजेना प्रोटोकॉल’ (Cartagena Protocol)
कार्टाजेना प्रोटोकॉल (Cartagena Protocol on Biosafety) एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसका उद्देश्य आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी (Modern Biotechnology) से विकसित जीवित संशोधित जीवों (Living Modified Organisms – LMOs) के सीमा-पार (Transboundary) आवागमन, उपयोग और व्यापार को इस प्रकार नियंत्रित करना है कि जैव विविधता (Biodiversity) और मानव स्वास्थ्य को कोई हानि न हो।
सरल भाषा में: यदि कोई देश Genetically Modified (GM) फसल, GM बीज या अन्य जीवित संशोधित जीव किसी दूसरे देश को भेजता है, तो यह प्रोटोकॉल सुनिश्चित करता है कि ऐसा कार्य सुरक्षित ढंग से हो।
✅ संबंधित है → Convention on Biological Diversity (CBD) से।
✅ अपनाया गया → 29 जनवरी 2000
✅ स्थान → मॉन्ट्रियल (कनाडा)
✅ लागू हुआ → 11 सितंबर 2003
✅ मुख्य उद्देश्य → Living Modified Organisms (LMOs) के सुरक्षित सीमा-पार आवागमन, उपयोग और व्यापार को सुनिश्चित करना।
✅ सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान → Advance Informed Agreement (AIA)
✅ मुख्य सिद्धांत → Precautionary Principle (सावधानी सिद्धांत)
✅ सूचना साझा करने की प्रणाली → Biosafety Clearing-House (BCH)
✅ भारत की प्रमुख संस्था → GEAC (Genetic Engineering Appraisal Committee)
✅ LMO = Living Modified Organism (जीवित संशोधित जीव)
✅ कार्टाजेना प्रोटोकॉल = Biosafety (जैव सुरक्षा
इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?
1990 के दशक में जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) के विकास से GM फसलें और Genetically Modified Organisms (GMOs) तेजी से विकसित होने लगे। इससे कई चिंताएँ उत्पन्न हुईं—
- क्या GM फसलें प्राकृतिक जैव विविधता को नुकसान पहुँचा सकती हैं?
- क्या वे स्थानीय पौधों की प्रजातियों को प्रभावित कर सकती हैं?
- क्या इनका मानव स्वास्थ्य पर कोई दुष्प्रभाव हो सकता है?
- यदि एक देश से दूसरे देश में GM बीज पहुँच जाएँ, तो उनका नियंत्रण कैसे होगा?
इन प्रश्नों के समाधान के लिए कार्टाजेना प्रोटोकॉल बनाया गया।
- अपनाया गया (Adopted): 29 जनवरी 2000
- स्थान: Montreal, Canada
- लागू हुआ (Entered into Force): 11 सितंबर 2003
मुख्य सिद्धांत (Key Principles)
1. Advance Informed Agreement (AIA)
यह इस प्रोटोकॉल की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था है।
यदि कोई देश पहली बार किसी LMO का निर्यात करना चाहता है, तो उसे—
- पहले आयात करने वाले देश को पूरी जानकारी देनी होगी।
- आयात करने वाला देश जोखिम का मूल्यांकन करेगा।
- उसके बाद ही अनुमति देगा या मना करेगा।
यानी—पहले सूचना, फिर अनुमति।
2. Precautionary Principle (सावधानी सिद्धांत)
यदि किसी LMO के प्रभाव के बारे में वैज्ञानिक जानकारी पूरी तरह उपलब्ध नहीं है, तब भी कोई देश सावधानी बरतते हुए उसके आयात को रोक सकता है।
याद रखें: “वैज्ञानिक अनिश्चितता होने पर भी पर्यावरण की सुरक्षा को प्राथमिकता।”
3. Risk Assessment (जोखिम मूल्यांकन)
आयात से पहले यह जाँचा जाता है कि—
- पर्यावरण पर प्रभाव क्या होगा?
- स्थानीय जैव विविधता प्रभावित होगी या नहीं?
- मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
4. Biosafety Clearing-House (BCH)
यह एक अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रणाली है जहाँ सदस्य देश—
- अपने निर्णय,
- वैज्ञानिक अध्ययन,
- जोखिम मूल्यांकन,
- नियम एवं दिशानिर्देश