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Kyoto Protocol (क्योटो प्रोटोकॉल)

क्योटो प्रोटोकॉल जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बनाया गया पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी (Legally Binding) अंतरराष्ट्रीय समझौता था। इसका उद्देश्य विकसित देशों द्वारा ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के उत्सर्जन को कम करना था।

परीक्षा के लिए एक-पंक्ति तथ्य

  • 1997 – क्योटो प्रोटोकॉल अपनाया गया।
  • 2005 – लागू हुआ।
  • UNFCCC के अंतर्गत पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी जलवायु समझौता।
  • केवल विकसित देशों पर उत्सर्जन घटाने का कानूनी दायित्व।
  • CBDR सिद्धांत पर आधारित।
  • तीन तंत्र: CDM, JI, Emissions Trading
  • पहला लक्ष्य: 2008–2012 में 1990 के स्तर से औसतन 5.2% उत्सर्जन में कमी।
  • दूसरा चरण: 2013–2020 (Doha Amendment)।
  • इसके बाद वैश्विक व्यवस्था का प्रमुख आधार Paris Agreement (2015) बना।

1. अपनाया गया (Adopted):

  • 11 दिसंबर 1997

2. लागू (Entered into Force):

  • 16 फरवरी 2005

मुख्य सिद्धांत

Common But Differentiated Responsibilities (CBDR)

  • सभी देशों की जलवायु परिवर्तन से लड़ने की जिम्मेदारी है।
  • लेकिन विकसित देशों की जिम्मेदारी अधिक मानी गई क्योंकि उन्होंने ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण किया है।
  • इसलिए बाध्यकारी लक्ष्य मुख्यतः विकसित देशों पर लागू किए गए।

तीन लचीले तंत्र (Flexible Mechanisms)

1. Clean Development Mechanism (CDM)

  • विकसित देश विकासशील देशों में पर्यावरण-अनुकूल परियोजनाओं में निवेश करते हैं।
  • बदले में उन्हें Carbon Credits (CERs) मिलते हैं।
  • भारत ने CDM के अंतर्गत बड़ी संख्या में परियोजनाएँ संचालित कीं।

2. Joint Implementation (JI)

  • एक विकसित देश दूसरे विकसित देश में उत्सर्जन कम करने वाली परियोजना में निवेश कर सकता है।

3. International Emissions Trading (IET)

  • जिन देशों के पास अतिरिक्त उत्सर्जन अनुमति (Carbon Credits) होती है, वे उन्हें अन्य देशों को बेच सकते हैं।

क्योटो प्रोटोकॉल की सीमाएँ

  • केवल विकसित देशों पर बाध्यकारी लक्ष्य थे।
  • कुछ प्रमुख उत्सर्जक देशों की सीमित भागीदारी रही; उदाहरण के लिए United States ने इसे अनुमोदित नहीं किया।
  • बाद में वैश्विक जलवायु नीति का केंद्र Paris Agreement बन गया, जिसमें लगभग सभी देशों ने अपने-अपने राष्ट्रीय लक्ष्य (NDCs) प्रस्तुत किए।

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